BHAGVAT GEETA ADHYAY 7
सातवां अध्याय: "भक्ति योग - भगवान के प्रति प्रेम और सेवा" भगवद गीता का सातवां अध्याय भक्ति योग के प्रमुख आस्थाओं, तत्त्वों, और फलों का विवेचन करता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति योग के महत्व को बताते हैं और भगवान के प्रति प्रेम और सेवा के माध्यम से आत्मा के साक्षात्कार की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। 1. भक्ति योग का मतलब: सातवां अध्याय में पहले भक्ति योग के मतलब का वर्णन है। भक्ति योग का मतलब होता है भगवान के प्रति पूर्ण प्रेम और सेवा करना, और भगवान के साथ प्रेमभाव से जुड़ना। इस योग में भक्त की पूर्ण समर्पण और प्रेम भगवान के प्रति होता है। 2. भक्ति योग की आस्थाएँ: सातवां अध्याय में भक्ति योग की प्रमुख आस्थाएँ विस्तार से बताई जाती हैं। इनमें भगवान के नाम का जाप, पूजा, संगीत, सत्संग, और सेवा शामिल होती हैं। ये आस्थाएँ भक्ति योग के प्रमुख तत्त्व होती हैं जो भक्त को भगवान के पास ले जाते हैं। 3. भक्ति योग का फल: सातवां अध्याय में भक्ति योग के फल का विवरण भी मिलता है। भक्ति योग के प्रणामी भक्त भगवान के पास जाते हैं और उन्हें भगवान का दर्शन और साक्षात्कार होता है।...