BHAGVAT GEETA ADHYAY 3
तीसरा अध्याय - "कर्मयोग" भ गवद गीता का तीसरा अध्याय, जिसे "कर्मयोग" भी कहा जाता है, गीता के प्रमुख अध्यायों में से एक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म और योग के महत्व के बारे में विस्तार से बताते हैं, जिससे व्यक्ति को जीवन में सही दिशा मिल सके। यहां तीसरे अध्याय के मुख्य बिंदुओं का विस्तार से वर्णन किया गया है: 1. कर्मयोग का परिचय: तीसरे अध्याय का नाम "कर्मयोग" है, जिसका अर्थ होता है "कर्म का योग"। इस अध्याय में कर्म और योग के साथ जीवन कैसे जीवना चाहिए, इसका विचार किया जाता है। 2. कर्म का तात्पर्य: कर्मयोग के अध्याय में कर्म के तात्पर्य को समझाया जाता है। कर्म का अर्थ है क्रिया या कार्य, और यह अध्यात्मिक उन्नति के माध्यम से आत्मा के प्रति समर्पण का एक माध्यम हो सकता है। 3. योग का महत्व: कर्मयोग के अध्याय में योग के महत्व का भी उल्लेख है। योग का अर्थ होता है यौकिकता और आत्मा के साथ एकीकरण करना, जिससे आत्मा का साक्षात्कार हो सके। 4. कर्म का समर्पण: तीसरे अध्याय में कर्म का समर्पण का महत्वपूर्ण रूप से वर्णन किया गया है। श्रीकृष्ण अ...